Bikaji Success Story: 8वी पास लडकेने सिर्फ भुजीया बेचकर खड़ी करदी 1400 करोड की कंपनी, जानिए शिवरतन अग्रवाल जी की सफलता की कहानी

Bikaji Success Story

Bikaji Success Story:भुजिया का नाम आते ही एक बड़ी सी काले रंग की कढ़ाई और लाख सफाई के बावजूद आसपास भिनभिनाती हुई मक्खियों वाली किसी हलवाई की दुकान की तस्वीर उभरती है। लेकिन बीकाजी ने इस तस्वीर को तोड़ा है। यूं कहें कि फूड चेन को दिखने में भी आकर्षक बनाने की शुरुआत की है। हालांकि बीकाजी ग्रुप का यह सफर आसान नहीं रहा। जी हां, आज हम बात करने जा रहे हैं बीकाजी ब्रांड के बारे में।

बीकानेर की आधी आबादी भुजिया बनाने में व्यस्त है तो आधी आबादी से खाने में। यह बात सच हो या नहीं पर हां इतना ज़रूर है कि कुल भुजिया का प्रोडक्शन के आधे से ज्यादा हिस्से पर बीकानेर के बीकाजी ग्रुप का ही राज है। बीकाजी ग्रुप के चेयरमैन शिवरतन अग्रवाल ने अपने ट्रेडिशनल बिजनेस को एक ग्लोबल पहचान दिलाई। बीकानेरी भुजिया के तीखे पन और रसगुल्लों की मिठास के अनोखे स्वाद को सात समंदर पार खाने के शौकीनों तक पहुंचाने और उसे खास पहचान दिलाने का क्रेडिट बीकाजी फूड्स को ही जाता है।

ऐसे हुई फैक्ट्री की शुरुआत।

जीवन में कुछ अलग और बेहतर करने का सपना लिए महज आठवीं पास शिवरतन अग्रवाल के मन में एक ऐसी भुजिया फैक्ट्री लगाने का खयाल आया जो महज एक भुजिया फैक्ट्री ना हो, बल्कि उसे एक ग्लोबल पहचान मिले। पुश्तों से भुजिया का कारोबार कर रहे शिवरतन के पिता को शुरू में तो यकीन ही नहीं हुआ कि भुजिया बनाने की कोई फैक्ट्री भी हो सकती है। 1987 में बीकानेर में भुजिया फैक्ट्री की शुरुआत हुई।

दो बैंकों ने भुजिया के नाम पर कर्ज देने से इनकार कर दिया था। जैसे तैसे एक बैंक कर्ज देने के लिए राजी हुआ। 1993 में फैमिली बिजनेस के बंटवारे के बाद बीकाजी ब्रांड की शुरुआत हुई। फैक्ट्री लगाने से पहले भी दिमाग में यही खयाल रहता था कि ऐसे किन होम अप्लायंसेज का सहारा लिया जाए, जिससे समय भी बचे, काम करने वालों को आसानी हो और ज्यादा क्वांटिटी में भुजिया, पापड़ आदि का प्रोडक्शन किया जा सके।

1400 करोड़ रुपए की है कंपनी।

शिवरतन अपने एक दोस्त मक्खन अग्रवाल के साथ पापड़ भुजिया को बनाने के काम में आने वाली सामग्री बेसन इत्यादि लेकर भटकते थे, ताकि डेमो देकर कुछ जरूरी उपकरण तैयार करवाए जा सकें। लेकिन अब बीकाजी फूड कंपनी आज 1400 करोड़ रुपए की कंपनी है जिसका सालाना टर्नओवर 500 करोड़ रुपए का है। अब भुजिया, पापड़ और रसगुल्लों के अलावा बीकाजी की पानीपुरी तक शानदार पैकिंग में उपलब्ध है। बीकाजी के यहां कुल 80 फूड आइटम बनते हैं।

फैक्ट्री के सारे कर्मचारी से है खास रिश्ता।

शिवरतन 63 साल की उम्र में आज भी रोज फैक्ट्री जाते हैं। भुजिया बनाने वाले से लेकर बाकी करने वाले कर्मचारी तक हर किसी पर उनकी नजर रहती है। वह सब को निजी तौर पर जानते हैं और ज्यादातर कर्मियों को उनके नाम से पुकारते हैं।
पिता दिवंगत मूलचंद और मां चुकी देवी के चार बेटों में से एक शिवरतन का सारा ध्यान इसी बात पर रहता है कि किस स्वाद या नई टेक्नीक का इस्तेमाल किया जाए, जिससे जायके की दुनिया में उनकी बादशाहत बरकरार रहे। इस काम में उनकी पत्नी सुशीला भी उनकी काफी मदद करती हैं।

24 देशों में फैला है कारोबार।

2010 में जियोग्राफिकल इंडिकेशन बीकानेर के नाम हुआ था। कभी बोरियों में भरकर ले जाए जाने वाली भुजिया को पहले कार्टन में पैक करके भेजा जाना शुरू हुआ। आज ऑटोमेशन पैकिंग के चलते बीकाजी के चमचमाते पैकेट्स ट्रेडिशनल फूड को आकर्षक बना रहे हैं। आज अमेरिका, योरप, खाड़ी के तकरीबन 24 देशों में बीकाजी के प्रोडक्ट्स को इम्पोर्ट किया जा रहा है। बीकाजी ने हर दिन 50 टन भुजिया के प्रोडक्शन का रिकॉर्ड भी बना लिया है।

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आने वाले सालों में और बढ़ेगा कारोबार।

शिवरतन अग्रवाल के बेटे दीपक अग्रवाल भी अब पिता के कारोबार में अपना हाथ बटा रहे हैं। 2014 में कंपनी ने एक नई श्रृंखला रेडी टू ईट रेडी टु कुक लॉन्च की है, जिसमें ट्रेडिशनल, इंडियन ब्रेकफस्ट पर फोकस किया गया है। बीकाजी ग्रुप ने अपने रिटेल आउटलेट भी खोले हैं, जहां उनके सभी प्रोडक्ट्स उपलब्ध हैं।

अब तक मुंबई समेत देशभर के कुल 25 शहरों में ये आउटलेट खोले जा चुके हैं। शिवरतन बताते हैं कि जल्द ही वो लंदन में बीकाजी का आउटलेट खोलने जा रहे हैं। जिन देशों में अभी बीकाजी के आउटलेट नहीं खुले हैं, वहां भी पॉसिबिलिटीज देखी जा रही हैं। उनकी कोशिश है कि कंपनी आनेवाले सालों में अपना आईपीओ भी लेकर आए।

कुल मिलाकर ये कहना गलत नहीं होगा कि इस कारोबारी की मेहनत, जुनून और करिश्मा ही है कि उन्होंने भुजिया जैसे ट्रेडिशनल बीकानेरी प्रोडक्ट को ग्लोबल बना दिया। शिवरतन लगन, मेहनत और कभी हार न मानने के जज्बे को ही अपनी सफलता का मंत्र मानते हैं।

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